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ग्रामीण जीवन एवं शहरीकरण | Rural Life and Urbanization

भारत में ग्रामीण समुदाय

एक लोकप्रिय कहावत है कि भारत में गाँवों में रहता है. कार्ल मार्क्स ने तो स्पष्ट रूप से भारतीय ग्रामीण समाज को एक बंद एशियाई समाज माना हैं. परम्परागत तौर पर यह माना गया कि भारतीय ग्रामीण जनता उदासीन है क्योंकि गाँव के लोग शांत रहते हैं एवं गाँव से बाहर की घटनाओं से अनभिज्ञ रहते हैं. परन्तु यह मात्र भारतीय ग्रामीण जीवन को दूर से देख कर गढ़ी गयी एक कल्पना मात्र है. ग्रामीण जीवन द्वारा स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी, देश के विभाजन का परिणाम,

भारतीय सन्दर्भ में, जहाँ घनत्व 4000 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. से कम तथा कम से कम 75 प्रतिशत पुरुष जनसंख्या कृषि कार्यों में लिप्त हों,

इसी आधार पर आंद्रे बिताई का मानना है कि ‘भारत में कृषक समाज की श्रेणी में मात्र कुछ जनजातियाँ ही आएंगी.’

ग्रामीण समाज, सामान्यतः आत्मनिर्भर होते हैं, यही कारण है कि चार्ल्स मेटकॉफ ने भारतीय ग्रामों को ‘छोटा गणतंत्र’

ग्रामीण समाज की विशेषताएँ –

  1. धार्मिक रूढ़िवादिता, जादू-टोना,
  2. प्रदत्त प्रस्थितियों के आधार पर सामाजिक स्तरीकरण पाए जाने के कर्ण जातिवादी व्यवस्था गहरी जमी रहती है इसीलिए छुआछूत,
  3. पंचायत प्रधान राजनीतिक व्यवस्था जटिल नहीं होती है.
  4. धर्म जीवन के सभी पक्षों पर प्रभावकारी भूमिका वाला करक होता है.
  5. छोटे अपराधों के लिए भी कठोर दंड की व्यवस्था मसलन ऑनर किलिंग
  6. लोक संगीत,
  7. संयुक्त परिवार प्रधान समाज

ग्रामीण समाज में परिवर्तनकारी कारक –

  1. औद्योगीकरण
  2. भौतिकवादिता
  3. नगरीकरण
  4. यातायात के साधनों में वृद्धि
  5. आधुनिक शिक्षा
  6. प्रवजन

शहरीकरण या नगरीकरण :

शहरीकरण या नगरीकरण आर्थिक उन्नति की सबसे बड़ी विशेषता है। अर्थव्यवस्था की क्रमिक विकास के साथ,

शहरी क्षेत्र के मानक :

1.भारतीय समाज में किसी क्षेत्र को शहरी क्षेत्र माने जाने के लिये आवश्यक है कि किसी मानव बस्ती की आबादी में 5000 या इससे अधिक व्यक्ति निवास करते हों।

2.इस मानव आबादी में कम से कम 75% लोग गैर-कृषि व्यवसाय में संलग्न हों।

3.जनसंख्या घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. से कम नहीं होना चाहिये।

4.इसके अतिरिक्त कुछ अन्य विशेषताएँ मसलन उद्योग,

शहरीकरण के कारण :

  1. .शहरीकरण का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण आर्थिक कारण है। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी एक व्यापक घटना है। किसानों को पर्याप्त पैसा कमाने और जीवन यापन करने में बहुत मुश्किल होती है।
  2. शिक्षा शहरीकरण का एक मजबूत कारण है। शहरी क्षेत्र उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करते हैं।
  3. पर्यावरणीय गिरावट भी शहरीकरण में योगदान करने में एक भूमिका निभाती है। वनों की कटाई कई किसान परिवारों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर देती है।
  4. सामाजिक कारण शहरीकरण का एक और उल्लेखनीय कारण है। कई युवा ग्रामीण लोग बेहतर जीवन शैली की तलाश में शहरी क्षेत्रों में पलायन करते हैं। इसके अलावा, को आकर्षित करने के लिए बहुत सी चीजें होती हैं।
  5. शहरीकरण के बढ़ने का एक प्रमुख कारण बेरोज़गारी है। शहरों में आने वाले लोगों में अधिक संख्या नौकरी की तलाश करने वालों की है
  6. गाँव से शहरों की ओर पलायन का मुख्य कारण वेतन-दर तो है ही इसके अलावा दो अन्य प्रमुख कारण है- जोत की कम भूमि और परिवार का बड़ा आकार,
  7. द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप शहरी क्षेत्रों में तीव्र गति से सरकारी सेवाओं में विस्तार हुआ,
  8. औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरुप शहरी क्षेत्रों में भौतिक सुख-सुविधाओं में वृद्धि हुई।.
  9. शहरी क्षेत्रों में बेहतर बुनियादी सुविधाएँ
  10. कृषि में होने वाले नुकसान की वज़ह से लोग कृषि छोड़कर रोज़गार की तलाश में शहर आते हैं।

 शहरीकरण से संबंधित समस्याएँ :-

  1. अतिशहरीकरण- भारत के अधिकांश शहर अतिशहरीकरण के शिकार हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि जब शहरी आबादी इतना बढ़ जाए की शहर अपने निवासियों को अच्छा जीवनशैली देने में असफल हो जाए तो वह स्थिति अतिशहरीकरण कहलाती हैं।  
  2. आवास और गंदी बस्तियों की समस्या- शहरी जनसंख्या में हो रही वृद्धि ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया है जिसमें आवास की समस्या प्रमुख है। यह समस्या आवास की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में देखने को मिलती है।  
  3. सामाजिक सुरक्षा का अभाव- ग्रामीण क्षेत्रों से नगरों में आने वाले लोग अधिकतर गरीब होते हैं,
  4. पारिवारिक विघटन- शहरीकरण के परिणामस्वरूप बड़े परिवार छोटे परिवारों में विभक्त हो गए हैं। इसके अतिरिक्त परिवारों में विवाह-विच्छेद,
  5. निर्धनता- ग्रामीण भारत गरीबी को छिपाने और उससे निपटने में ज़्यादा सक्षम है। जबकि शहरी भारत में ऐसा संभव नहीं हैं। शहरी गरीबी बढ़ती जा रही है,
  6. पर्यावरण समस्या- शहरी केंद्रों में जनसंख्या के लगातार बढ़ते रहने एवं औद्योगीकरण के फलस्वरूप पर्यावरण प्रदूषण तथा अवनयन की कई समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। महानगरों और शहरों में प्रदुषण का मुख्य कारण वाहनों एवं औद्योगिक संस्थानों द्वारा निकला विषैला रसायन है।
  7. नृजातीय विविधता और सामुदायिक एकीकरण की समस्या- शहर की सामाजिक संरचना ऐसी होती है कि लोगों के एकीकृत होने की समस्या सदैव विद्यमान रहती है। 
  8. आर्थिक असमानता- भारतीय शहरों में आर्थिक असमानता विकसित देशों की तुलना में अधिक है। महानगरों पर खर्च की गई आय ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक होती है। इस आर्थिक अंतर के परिणामस्वरूप ग्रामीण शहरों की ओर आकर्षित होते हैं।   
  9. जनांकिकीय असंतुलन की समस्या- भारत में पश्चिमी देशों की तुलना में शहर प्रवास की प्रवृत्ति पुरुषों में ज़्यादा है। जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादक पुरुष जनसंख्या में कमी आ रही है। 

शहरीकरण का प्रभाव :-

  1. शहरीकरण की प्रक्रिया के चलते आज संयुक्त परिवार एकाकी परिवार में बदल रहे हैं। परिवार का आकार सिकुड़ रहा है तथा नातेदारी संबंध कमज़ोर हुए हैं। 
  2. शहरीकरण ने जाति व्यवस्था पर भी प्रभाव डाला है। वर्तमान में जातीयता के प्रति कटुता में कमी आई है। 
  3. शहरीकरण ने धार्मिक क्षेत्र पर भी प्रहार किया है। ध्यान देने वाली बात यह है कि शहरों में लोगों की धर्म से आस्था होती है लेकिन वे धर्म के नाम पर आडंबर पर विश्वास नहीं करते हैं। 

शहरीकरण की समस्या से निपटने के लिये सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास :-

  1. सरकार द्वारा शहरों के ठीक प्रकार से नियोजन के लिये स्मार्ट सिटी मिशन की अवधारणा को अपनाया गया है।   
  2. देश के आधे से अधिक लोगों का जीवन खेती पर निर्भर है,
  3. प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के अंतर्गत अभिनव एवं आधुनिक निर्माण प्रौद्योगिकी के उपयोग की सुविधा प्रदान करने के लिये प्रौद्योगिकी सब-मिशन भी शुरू किया गया है।
  4. जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन के अंतर्गत शहरों का कायाकल्प करने का प्रयास किया जा रहा है।
  5. कायाकल्प और शहरी रूपान्तरण के लिये अटल मिशन यानी अमृत योजना के अंतर्गत शहरों की अवसंरचना को मज़बूत किया जा रहा है।

शहरीकरण का महत्व :

  1. विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक़,
  2. शहरीकरण के कारण आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।
  3. शहरीकरण और शिक्षा के विकास के कारण जाति-प्रथा जैसी व्यवस्थाएँ अब ध्वस्त हो रही हैं।
  4. प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी के चलते लोगों रहन-सहन का स्तर बेहतर होता है
  5. उत्पादकता को बढ़ाता है और विशेष रूप से मैन्युफैक्चरिंग और सेवाओं में रोजगार सृजन को प्रोत्साहित करता है।

औद्योगिक समाज :

‘औद्योगिक समाज से एतात्प्री एक ऐसी विशिष्ट संस्कृति, संस्था या अन्तः क्रिया के विशिष्ट प्रतिमान से है जो औद्योगिक उत्पादन की प्रक्रिया से प्रभावित है’

1.इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया

2.जनसंख्या के घनत्व तथा आकार वृहद

3.प्रत्येक कार्य के लिए विशेषीकृत संस्थाएँ

4.द्वितीयक समूहों एवं सम्बन्धों की प्रधानता

5.सम्बन्धों में भावनात्मक निकटता के स्थान पर उपयोगिता एवं तार्किकता का अत्यधिक महत्त्व

6.अर्थतन्त्र सर्वाधिक प्रभावकारी पक्ष जिसमें आर्थिक क्रियाएँ सर्वोपरी होती है तथा वह अन्य सभी प्रकार की क्रियाओं पर गहरा प्रभाव डालती है.

7.व्यक्तिवाद, स्वतन्त्रता आदि का स्थान व्यक्ति के जीवन में सर्वाधिक

8.धर्मान्धता के स्थान पर धार्मिक निरपेक्ष मूल्यों का स्थान सर्वाधिक   

9. धार्मिक रुदिवादिता का पूर्णतया अभाव

10.ऐसे समाज व्यक्ति के जीवन में अन्वेषण,

11.दुर्खीम के अनुसार ‘औद्योगिक समाजों में आत्महत्या,

उत्तर-औद्योगिक समाज :

‘उत्तर औद्योगिक समाज वह है जिसमें ज्ञान सम्पत्ति का आधार होता है’ – डेनियल बेल

1.उत्तर-औद्योगिक समाज की अवधारणा डेनियल बेल ने अपनी पुस्तक The

2.इस समाज में स्तरीकरण का आधार अक्षीय सिद्धांत पर आधारित होगा अर्थात बौद्धिकता (ज्ञान) के आधार पर ही समाज में धन, पद एवं प्रतिष्ठा का बंटवारा होगा.

3. तकनीकी विशेषज्ञ

4.समाज की अर्थव्यवस्था, सेवाक्षेत्रक

पश्चिमीकरण एवं आधुनिकीकरण :-

1.  डॉ. एम. एन. श्रीनिवास ने भारतीय समाज में परिवर्तन की प्रक्रियाओं का अध्ययन करते हुए ‘संस्कृतिकरण’ एवं ‘पश्चिमीकरण’ की अवधारणाओं को प्रतिपादित किया है.

2.  डॉ. एम. एन. श्रीनिवास ने अपनी पुस्तक Religion and Societyamong the Coorgs of South India में संस्कृतिकरण को परिभाषित करते हुए लिखा है कि ‘संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई निम्न हिन्दू जाति या कोई जनजाति अथवा कोई अन्य समूह किसी उच्च और प्रायः द्विज जाति की दिशा में अपने रीति-रिवाज, कर्मकांड विचारधारा और पद्धति को बदलता है. सामन्यतः ऐसे परिवर्तनों के बाद निम्न जाति, जातीय संस्करण की प्रणाली में स्थानीय समुदाय में उसे परम्परागत रूप से जो स्थिति प्राप्त है, उससे उच्च स्थिति का दावा करने लगती है. सामान्यतः बहुत दिनों तक बल्कि वास्तव में एक-दो पीढ़ियों तक दावा किये जाने के बाद ही उसे स्वीकृति मिलती है.’   

3.  डॉ. एम. एन. श्रीनिवास ने पश्चिमीकरण को परिभाषित करते हुए लिखा है कि ‘भारतीय समाज एवं संस्कृति के  वे परिवर्तन जो एक सौ पचास वर्षों से अधिक समय के अंग्रेजी राज के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुए हैं और यह शब्द प्रौद्योगिकी, संस्थाओं, वैचारिक मूल्यों, आदि विभिन्न स्तरों पर होने वाले परिवर्तनों का समावेश करता है.’

यूरोप, अमेरिका आदि देशों में भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में तीव्र प्रगति हुई। विभिन्न वैज्ञानिक आविष्कारों के बदौलत चिकित्सा, व्यापार, परिवहन, शिक्षा इत्यादि क्षेत्रों में काफी प्रगति हुई। इस प्रगति के कारण पाश्चात्य देशों का विश्व के सभी देशों के ऊपर काफी  प्रभुत्व स्थापित हुआ। भारत में भी अमेरिका एवं यूरोप आदि देशों के विकास का लोहा माना गया और उन्हें आदर्श मान उनका अनुकरण किया जाने लगा। भारत में इन देशों की बढ़ती प्रतिष्ठा के कारण पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति को अपनाने की एक होड़ सी पैदा हो गई। भारत के साथ अन्य देशों में भी पाश्चात्यीकरण की बयार बहने लगी। इसके साथ ही विकसित हुए प्रत्येक प्रचलन एवं खोजों को भी पाश्चात्यीकरण का रूप माना जाने लगा। धीरे-धीरे आधुनिकीकरण एवं पाश्चात्यीकरण को एक माना जाने लगा.आधुनिकीकरण एवं पाश्चात्यीकरण एक नहीं हैं अपितु ये एक दुसरे से भिन्न हैं।मनुष्य जब परंपरागत विचारों, कार्यों, पद्धतियों और जीवनशैली को प्रभावी समयानुसार एवं अर्थपूर्ण बनाने के लिये जब उसमें नए नए विचारों, सोच एवं तकनीक का समावेशन करता है तो यह प्रक्रिया आधुनिकीकरण का रूप ले लेती है। जबकि पाश्चात्यीकरण का अर्थ पश्चिमी गोलार्द्ध में स्थित देश मुख्यतः फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली तथा अमेरिका से लगाया जाता है।क्योंकि इन देशों ने ही भूतकाल में वैज्ञानिक, आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक आदि क्षेत्रों में बहुत अधिक प्रगति की थी अतः इनकी  धाक संपूर्ण विश्व में स्थापित हो गई है। इस सफलता और विकास से प्रभावित होकर बाकी देश भी इन देशों की सभ्यता और संस्कृति को अपनाने लगे। इन देशों की वैज्ञानिक सोच एवं पद्धति को अपनाने के साथ इनके रहन-सहन, वेश-भूषा और खान-पान तथा दिनचर्या को भी अपनाने लगे। हम ऐसा भी कह सकते हैं कि पश्चिमी देशों की सभ्यता एवं संस्कृति का अनुकरण  और उसे आत्मसात करने की प्रक्रिया ही पाश्चात्यीकरण है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि दोनों अवधारणाएँ एक नहीं अपितु एक ही प्रकृति एवं प्रक्रिया से विकसित दो भिन्न तत्त्व हैं। हालांकि इन दोनों में काफी समानताएँ हैं जिसके कारण इन्हें एक माने जाने की भूल होती रहती है किंतु बारीकी से गौर करने पर इनके मध्य  विषमताएँ भी दृष्टिगोचर होती हैं।अगर समानताओं की बात करें तो दोनों ही वर्तमान काल की प्रक्रियाएँ हैं जो वैज्ञानिक उन्नति के कारण प्रकाश में आई थीं। चूँकि पाश्चात्य देशों द्वारा आधुनिकीकरण को अधिक तीव्रता से अपनाया गया अतः वे आधुनिकीकरण के पर्याय बन गए। वस्तुतः आधुनिकीकरण की आधुनिक अवधारणा का विकास पश्चिमी जगत से ही हुआ था इसलिये भी पश्चिमीकरण को आधुनिकीकरण मान लिया जाता है. वास्तव   में   जब   हम   परपंरागत   समाजों   में   होने   वाले   परिवर्तन   का   अध्ययन   करते   हैं   तो   हम   आधुनिकीकरण   की   अवधारणा   का   ही   प्रयोग   करते   हैं   जैसा   कि   बैनडिक्स  ( 1967)  कहते   हैं –  ‘‘ आधुनिकीकरण   से   मेरा   तात्पर्य   1760-1830   में   इंग्लैण्ड   की   औद्योगिक   क्रांति   तथा   1784-1794   में   फ्रांस   की   क्रांति   के   दौरान   उत्पन्न   हुए।   बैनडिक्स   की   परिभाषा   के   विश्लेषण   से   स्पष्ट   होता   है   कि   परंपरागत   इंग्लैण्ड   में   औद्योगिकीकरण   एवं   फ्रांस   में   फ्रांस   की   क्रांति   के   कारण   तत्कालीन   समाज   में   सामाजिक ,  आर्थिक ,  राजनीतिक ,  शैक्षिक   तथा   अन्य   क्षेत्रों   में   उल्लेखनीय   परिवर्तन   हुए।   पश्चिमी   देशों   में   होने   वाले   परिवर्तनों   का   अनुकरण   यदि   अन्य   देश   करते   हैं   तो   इसे   आधुनिकीकरण   कहा   जाएगा। आज   भी   भारत   की   दो – तिहाई   जनता   गाँवों   में   निवास   करती   है   जो   परम्परावादी   हैं   और   प्राचीन   काल   से   चली   आ   रही   परम्पराओं   के   पक्के   अनुयायी   हैं।   लेकिन   आधुनिकता   से   वे   भी   अछूते   नहीं   हैं।   यातायात ,  रेल ,  संचार ,  मोटर   समाचार   पत्र ,  शिक्षा ,  प्रशासन ,  सामुदायिक   योजनाओ   ंआदि   ने   आधुनिकीकरण   को   बढा़वा   दिया   है ,  जिससे   भौतिक   ही   नहीं ,  सांस्कृतिक   परिवर्तन   भी   हुए   हैं।   वहीं   नए   मूल्य ,  संबंध   व   अपेक्षाएं   भी   जन्म   ले   रही   हैं।   वास्तव   में   परम्परा   व   ग्राम   व्यवस्था   में   एकरूपता   व   स्थिरता   दिखाई   देती   है ,  परन्तु   उसके   विभिन्न   आधारभूत   सिद्धांतों   में   परिवर्तन   हुए   हैं   और   वे   नये   रूप   को   ग्रहण   कर   रहे   हैं ,  परिवार ,  जाति ,  स्थानिकता ,  धर्म   आदि   के   संदर्भ   में   भी   आधुनिकीकरण   हो   रहा   है।   परिवार   में   व्यक्तिवाद   का   उभार   हो   रहा   है ,  जो   कि   पहले   सामूहिकता   पर   आधारित   थे।   वर्तमान   में   समूह   में   लिगं ,  आयु   व   संबंध   के   आधार   पर   अधिकार   का   निर्धारण   न   होकर   योग्यता ,  अनुभव   तथा   ज्ञान   के   आधार   पर   होता   है।   जाति   के   भेद   में   व्यवसाय ,  संस्तरण ,  कर्मकाण्ड   व   पवित्रता   की   धारणा   में   अपेक्षित   परिवर्तन   हुए   हैं।   विवाह   से   संबंधित   नियमों   की   कठोरता   अभी   भी   विद्यमान   है।   जाति   सुधार   आंदोलनो   द्वारा   विभिन्न   जातियों   के   मेलजोल   बढ़   रहे   हैं।   जजमानी   प्रथा   तथा   व्यवसाय   में   परिवर्तन   हुए   हैं।आधुनिकता   के   प्रभाव   ने   इस   परम्परागत   सोच   को   चुनौती   दे   दी   है।   अब   पुत्र   और   पुत्री   में   कोई   भेद   नहीं   किया   जाता ,  यद्यपि   हर   गाँव   या   समाज   में   समान   आधुनिक   दृष्टिकोण   दिखाई   नहीं   देता।   अब   छोटे   परिवारों   में   1   या   2   बच्चे   होते   हैं।   चाहे   वह   पुत्र   हो   या   पुत्रियाँ।   अब   तो   लड़कियाँ   पुरातन   रूढ़ियों   को   तोडक़र   पिता   का   अंतिम   संस्कार   व   श्राद्धकर्म   भी   कर   रही   मातृदवेी   की   पूजा   सिन्धुकाल   से   ही   भारतीय   समाज   में   प्रचलित   थी ,  जिसे   वैदिक   काल   में   माता ,  पृथ्वी ,  अदिति   आदि   नामों   से   जाना   गया।   पुराणकाल   में   इसे   पार्वती ,  दुर्गा ,  काली ,  महिषमर्दिनी   भवानी   आदि   नामों   से   विभूषित   किया   गया।   वर्तमान   में   कई   नये   नामों   से  ( संतोष   माता ,  वैभव   माता   आदि )  इस   मातृदवेी   की   पूजा   की   जा   रही   है।   इसी   तरह   व्रत ,  त्योहार   आदि   मनाने   की   पद्धति   में   बदलते   समय   के   अनुरूप   अनेक   सुविधाजनक   परिवर्तन   हो   गए   हैं ,  लेकिन   इनका   प्रचलन   बदस्तूर   जारी   है।   यही   नहीं   शादी – विवाह   अन्य   कई   अवसरों   पर   फिजूलखर्ची   और   शानोशौकत   का   प्रदर्शन   करने   वाले   भारतीय   आवश्यकता   पड़ने   पर   रष्ट्र   के   लिए ,  निजी   और   सरकारी   संस्थाओं   के   लिए   या   व्यक्तिगत   रूप   से   भी   असहाय   लोगों   की   सहायता   के   लिए   तत्पर   रहते   हैं।   इससे   यह   सिद्ध   होता   है   कि   हम   आधुनिकता   के   इस   दौर   में   भी   पारम्परिक   विचारों   के   ही   पोषक   हैं।   वर्तमान   हकीकत   यही   है   कि   हम   सभी   आधुनिक   समय ,  विचारों ,   पाश्चात्य   सभ्यता   और   संस्कृति   से   प्रभावित   हैं।   फिर   भी   हमने   अपनी   परम्पराओं   को   उनके   परिवर्तित   स्वरूप   में   जीवित   रखा   है।

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