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भारतीय समाज Indian Society, Bhartiey Samaj

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समाज का अर्थ एवं परिभाषा –

  • ‘समाज मनुष्यों के समूह का नाम नहीं बल्कि यह मनुष्यों के अन्तःसम्बन्धों की जटिल व्यवस्था है’ – लोपियर‘
  • समाज उन व्यक्तियों का समूह है जो अन्तः क्रिया द्वारा सम्बन्धित है’ – जॉर्ज सिमेल‘
  • समाज एक अमूर्त धारणा है जो एक समूह के सदस्यों के मध्य पाए जाने वाले आपसी सम्बन्धों की सम्पूर्णता का बोध कराती है’. – रयूटर‘
  • समाज कार्यप्रणालियों व रीतियों की अधिकार सत्ता एवं पारस्परिक सहायता की, अनेक समूहों एवं श्रेणियों की तथा मानव-व्यवहारों के नियंत्रणों एवं स्वतंत्रताओं की एक सदैव परिवर्तनशील जटिल व्यवस्था है’ – मैकाइवर‘
  • सभी ज्ञातमान समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है’ – कार्ल मार्क्स‘
  • मनुष्य जन्म से स्वतंत्र है किन्तु वह सर्वत्र जंजीरों से बंधा है’ – रूसो‘
  • समाज एक सावयवी समग्र (Organic Whole) है’ – सेंट साइमन‘
  • जहाँ कहीं जीवन हैं वहीं समाज हैं’ – मैकाइवर – पेज‘
  • समाज से बिलकुल भिन्न एक समाज कोई ऐसा संगठन है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपना जीवन व्यतीत करता है’ – रयूटर‘
  • यह व्यक्ति पर निर्भर नहीं करता है कि वह कौनसा कार्य करेगा, बल्कि उसके कार्य समाज द्वारा निर्धारित किये जाते हैं. वह उसे करने के लिए बाध्य होता है तथा यह सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होता है’ – इमाइल दुर्खीम  

समाज की विशेषताएँ – 

  1. समाज एक सार्वभौमिक अवधारणा है.
  2. समाज एक प्रतिमान, एक व्यवस्था है न कि एक व्यक्ति.
  3. गिन्डिंग्स ‘पारस्परिक जागरूकता’ (समानता / सजातीयता Reciprocal Awareness ) को समाज का आवश्यक तत्व मानता है उसके अनुसार ‘समाज समान मानसिक चेतना युक्त व्यक्तियों का समूह है जो अपनी समान मानसिकता से परिचित हैं तथा इसमें  आनंद महसूस करते हैं और इसीलिए सम्मिलित उद्देश्यों की पूर्ति हेतु मिलकर कार्य करते हैं.’
  4. समाज के निर्माण एवं स्थायत्व के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक सदस्यों के मध्य अन्तर्सम्बंधों का होना है.
  5. समाज एक अमूर्त धारणा है.
  6. सहयोग-संघर्ष की भावना विद्यमान होती है अर्थात समाज में एकता-समरसता एवं सहयोग-संघर्ष साथ साथ चलते रहते हैं.
  7. समाज में असमानता विद्यमान रहती है.
  8. समाज में स्तर भिन्नता की चेतना रहती है.
  9. सदस्य अन्योन्याश्रित निर्भर होते हैं
  10. समाज संगठन-विघटन कारी समूह होता है अर्थात उसमें अखंडता का अभाव होता है
  11. समाज की अपनी एक संस्कृति होती है.
  12. समाजशास्त्र में समाज का अर्थ व्यक्तियों के समूह से नहीं है. जब तक समूह अन्तःक्रिया द्वारा सम्बन्धित न हो उसे समाज नहीं बोला जा सकता है अर्थात किसी उद्देश्य, लक्ष्य पूर्ति हेतु अंतः क्रिया द्वारा स्थापित सम्बन्ध के बिना समाज नहीं बोला जा सकता (Indian Society Bhartiey Samaj)

समाज का विकास :- ऑगस्ट कॉम्टे के अनुसार समाज का विकास निम्न चरणों के अंतर्गत हुआ है –

  1.  आखेटक समाज
  2. पशुपालक समाज
  3. कृषक समाज 
  4. औद्योगिक समाज

कृषक समाज :-

1.आंद्रे बिताई के अनुसार ‘जनजातीय गाँवों को मिलाकर कृषक समाज जिसका भूमि से गहरा लगाव होता है’

2.रेडफील्ड के अनुसार ‘कृषक समाज’ एक ‘अवशिष्ट श्रेणी’ (Residual Category) है  ‘ग्रामीण भारत से जनजातीय भारत को अलग करने पर जो कुछ शेष बचता है वही कृषक समाज है.’

जनजातीय समाज :- ‘सभ्यता एवं आधुनिकता से दूर विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान वाले वनों के निवासी लोगों का समूह’ जिसकी विशेषताएँ निम्न हैं –

  1. सामान्य भू -भाग
  2. सामान्य संस्कृति
  3. अन्तर्विवाह
  4. काला जादू
  5. सामान्य धर्म
  6. भाषा में लिपि का अभाव
  7. स्त्रियों में गोदाना अत्यावश्यक
  8. बहुदेवतावादी धर्म
  9. आर्थिक आत्मनिर्भरता
  10. सामान्य निषेध
  11. युवागृह (Dormitoy) की मान्यता
  12. झूम खेती
  13. भित्ति-चित्रों की परम्परा
  14. स्त्री-पुरुषों में आभूषण प्रेम
  15. हम्बल ने जनजातीय समाजों के लिए राजनीतिक संगठन की अनिवार्यता को आवश्यक नहीं माना है.

एक समाज :-

‘जब समाज शब्द का प्रयोग विशेष सांस्कृतिक जीवन शैली वाले व्यक्तियों के लिए किया जाता है तो समाजशास्त्रीय दृष्टि से इसे एक समाज बोला जाता है’

1.‘व्यक्तियों के एक समूह’ के रूप में समाजशास्त्रियों द्वारा उल्लेखित परिभाषा ‘एक समाज’ की है.

2.जब हम ‘भारतीय समाज’ एवं ‘पश्चिमी समाज’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं तो हमारा मन्तव्य भारत अथवा पश्चिम के जन समूह विशेष (एक समाज) कि विशेषताओं को इंगित करना होता है. इस ‘जन समूह विशेष’ को हम समाज नहीं कहेंगे क्योंकि समाज तो सामाजिक सम्बन्धों का अमूर्त जाल है, व्यक्तियों का मूर्त समूह नहीं.संरचनात्मक समाज :‘समाज जनरीतियों, रुढियों, संस्थाओं, आदतों, भावनाओं एवं आदर्शों की विरासत है’.

1.  प्रतिपादक – गिन्सबर्ग, गिडिंग्स एवं क्यूबरप्रकार्यात्मक समाज :‘समाज परस्पर अन्तः क्रियाओं से सम्बन्धित समूहों का मिश्रण है जो प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छाएँ पूरे करने एवं पाने लक्ष्यों की पूर्ति में सहयोग करते हैं’.

2.  प्रतिपादक – मैकाइवर

एक समाज (A Society)समाज (Society)
सरल व्यवस्था वाला समाजजटिल व्यवस्था वाला समाज
विशेष संस्कृति वाले व्यक्तियों का ‘मूर्त समूह’सामाजिक अन्तर्सम्बन्धों युक्त ‘अमूर्त समूह’
निश्चित भौगोलिक क्षेत्रअनिश्चित भौगोलिक क्षेत्र
सीमित उत्तरदायित्वअसीमित उत्तरदायित्व
छोटा आकारविशाल आकार
विशेष जीवन शैलीसामान्य जीवन शैली
सचेतन प्रयास का परिणामस्वाभाविक विकास का परिणाम
अनिवार्य सदस्यतासदस्यता ऐच्छिक
समाज के भीतर अनेक ‘एक समाज’ पाए जाते हैअधिक विस्तृत व्यापक क्षेत्र हो सकते है
Indian Society Bhartiey Samaj
सरल समाजजटिल समाज
कम विकसित प्रौद्योगिक समाज होने के कारण विभेदीकरण एवं श्रम विभाजन न के बराबरविकसित प्रौद्योगिक समाज होने के कारण अधिक विभेदीकृत समाज
आदिम कृषक परम्परागत समाजमुक्त आधुनिक सभी औद्योगिक समाज
कृषि पशुपालन आधारित सरल अर्थव्यवस्थातकनीकी आधारित जटिल औद्योगिक अर्थव्यवस्था
मानवीय सम्बन्धों, सम्वेदनाओं, सामाजिक समूहों, परम्पराओं, रीति-रिवाजों एवं सामाजिक संस्थाओं की प्रभावी भूमिकाप्रौद्योगिकृत तकनीकी मानवीय सम्बन्धों, परम्पराओं, संस्कृति एवं सामाजिक संस्थाओं पर आधारित
धर्म एवं अध्यात्म की प्रभावी भूमिकाव्यवसायिक हितों की प्रभावी  भूमिका
रुढ़िवादी समाज जिसमें धर्म, नैतिकता एवं प्रथाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला मुक्त समाज जिसमें धर्म, नैतिकता एवं प्रथाएँ अप्रभावी होते हैं.
स्त्रियों की भूमिका पारिवारिक एवं कृषि कार्यों तक सीमितस्त्रियाँ आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं
सामाजिक परिवर्तनशीलता की गति मंदसामाजिक परिवर्तनशीलता की गति तीव्र
सामजिक स्तरीकरण एवं व्यक्तियों की भूमिका व प्रस्थिति के निर्धारण का आधार जन्म, प्रथा एवं परम्पराएँवैयक्तिक योग्यता एवं गुण शिक्षा, धन, व्यवसाय आदि के आधार पर व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति एवं भूमिका का निर्धारण
जाति व्यवस्था अत्यधिक प्रभावकारीवर्ग-व्यवस्था महत्त्वपूर्ण
स्त्रियों की निम्न स्थितिस्त्रियों की उच्च स्थिति
प्रथा, जनमत, रुढ़ि, धर्म, नैतिकता सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक साधन होते हैक़ानून, पुलिस, प्रशासन, अदालत आदि सामाजिक नियन्त्रण के औपचारिक साधन होते है
जनसंख्या, क्षेत्र और सामाजिक संपर्कों की परिधि की दृष्टि से छोटे समाज होते हैआकार में विशाल समाज
साहित्य, व्यवस्थित कला-विज्ञान एवं अध्यात्म विद्या का अभावसाहित्य, कला-विज्ञान का विशेष महत्त्व
वैज्ञानिक दृष्टिकोण की भूमिका नगण्यजीवन के हर पक्ष में तार्किक वैज्ञानिक दृष्टिकोण हावी
भाग्वादिता एवं रुढ़िवादी जड़े अत्यधिक गहरीलगभग नगण्य
सामजिक कुरुतियाँ, धार्मिक आडम्बर तथा अंधविश्वास से भरा जीवनन के बराबर
प्राथमिक सामाजिक समूहों एवं प्राथमिक सम्बन्धों की प्रधानताद्वैतीयक सम्बन्धों एवं समूहों की प्रधानता
परिवार, नातेदारी का अत्यधिक महत्त्वअपेक्षाकृत कम महत्त्व
Indian Society Bhartiey Samaj

प्रसिद्ध पुस्तकें :-

  1. सोसाएटी – मैकाइवर पेज
  2. माइंड एंड सोसाएटी – विल्फ्रेड़ो पैरेटो
  3. दी सोशियोलॉजी ऑफ़ रिवोल्युशन – सोरोकिन
  4. सोशल ओर्गेनाइजेशन – सी.एच.कूले
  5. दी स्ट्रक्चर ऑफ़ सोशल एक्शन – टोलकट पारसंस
  6. सोशल थ्योरी एंड सोशल स्ट्रक्चर – आर.के.मर्टन
  7. सोशियोलॉजी – टी.बी.बोटोमोर
  8. प्रिंसिपल्स ऑफ़ सोशियोलॉजी – हर्बर्ट स्पेंसर
  9. दी रूल्स ऑफ़ सोशियोलॉजी मैथड – इमाइल दुर्खीम

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REET 2020 Social Studies Syllabus

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